JNU में गूंजी मानस भारद्वाज की आवाज, एकल अभिनय ‘गट्टू भैया ने सुसाइड क्यों नहीं की’ ने दर्शकों को हंसाया भी और रुलाया भी

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नई दिल्ली : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का परिसर देश में न केवल अकादमिक विमर्श के लिए जाना जाता है, बल्कि यह कला, साहित्य और रंगमंच के क्षेत्र में भी नए प्रतिमान गढ़ने का केंद्र रहा है। इसी प्रतिष्ठित परिसर का सभागार हाल ही में एक बेहद भावुक, संवेदनशील और विचारोत्तेजक शाम का गवाह बना। अवसर था देश के उभरते हुए जाने-माने कवि, लेखक और किस्सागो मानस भारद्वाज के विशेष एकल अभिनय (Solo Performance) “गट्टू भैया ने सुसाइड क्यों नहीं की” का मंचन।

करीब डेढ़ घंटे (90 मिनट) तक चले इस एकल नाटक ने सभागार में मौजूद दर्शकों को आदि से अंत तक न केवल बांधे रखा, बल्कि उन्हें जज्बातों के एक ऐसे सफर पर ले गया जहां हंसते-हंसाते अचानक पूरा माहौल बेहद गंभीर हो गया और अंत में दर्शकों की आंखें नम हो गईं। आधुनिक दौर में जहां भव्य सेट्स और बड़े तामझाम के बिना नाटक की कल्पना मुश्किल होती जा रही है, वहीं मानस भारद्वाज ने न्यूनतम संसाधनों के साथ मंच पर जो जादू बिखेरा, उसने यह साबित कर दिया कि एक मजबूत कथ्य और बेहतरीन अभिनय किसी भी प्रस्तुति की असली जान होते हैं।

एक आवाज, तीन किरदार और मध्यमवर्गीय जीवन का गहरा द्वंद्व

इस नाट्य प्रस्तुति की मूल आत्मा एक छोटे से कस्बे से निकलकर देश की राजधानी दिल्ली पहुंचे एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के किशोर के जीवन पर आधारित है। वह किशोर, जिसे दुनिया ‘गट्टू भैया’ के नाम से जानती है, अपने भीतर बड़े सपने, पारिवारिक उम्मीदें और एक अनजाना डर लेकर महानगर की इस अंधी दौड़ में शामिल होता है। बड़े शहर की चकाचौंध, यहां की व्यस्त और संवेदनहीन जीवनशैली के बीच एक सीधे-सादे युवा के भीतर चलने वाले मानसिक द्वंद्व, अकेलेपन और अस्तित्व के संघर्षों को मानस भारद्वाज ने बेहद संजीदगी और बारीकी से पर्दे पर उतारा।gattu bhaiya

इस पूरे शो की सबसे बड़ी और अभूतपूर्व खासियत यह रही कि मानस भारद्वाज ने अकेले ही पूरे मंच को संभाला। मंच पर कोई दूसरा सह-कलाकार नहीं था, न ही कोई भारी-भरकम बैकग्राउंड स्कोर या प्रॉप्स थे। मानस ने केवल अपनी आवाज़ के जादुई उतार-चढ़ाव (Voice Modulation), हाव-भाव और सधे हुए शारीरिक अभिनय के दम पर तीन अलग-अलग किरदारों को जीवंत कर दिया। दर्शक एक पल के लिए भी यह नहीं भूल पाए कि वे एक ही व्यक्ति को देख रहे हैं, फिर भी उन्हें मंच पर तीन अलग-अलग जिंदगियां साफ तौर पर तैरती हुई नजर आईं। छोटे कस्बे के माता-पिता की चिंता, दोस्तों का अल्हड़पन और खुद गट्टू के भीतर का कोलाहल—इन सबको मानस ने अपनी आवाज के जरिए एक सुर में पिरो दिया।

किस्सागोई के ताने-बाने में घुलीं 20 शानदार कविताएं

मानस भारद्वाज मूलतः एक बेहद संवेदनशील कवि और कहानीकार हैं। हाल ही में प्रकाशित हुआ उनका नया कविता संग्रह “मैं एक ऐसी लड़की को जानता हूँ” साहित्य जगत में काफी चर्चा बटोर रहा है और पाठकों द्वारा इसे बेहद सराहा गया है। अपनी इसी लेखनी की धार को उन्होंने इस नाटक के ताने-बाने में भी बेहद खूबसूरती से पिरोया।

“गट्टू भैया ने सुसाइड क्यों नहीं की” की प्रस्तुति के दौरान किस्सागोई (Storytelling) के बीच-बीच में लगभग 20 शानदार कविताएं और नज्मों का समावेश किया गया था। ये कविताएं नाटक की गति को रोकती नहीं थीं, बल्कि कहानी की संवेदनशीलता को और गहरा करती थीं। जब-जब गट्टू के जीवन में कोई भावुक मोड़ आता, मानस की कविताएं दर्शकों के दिलों पर सीधे दस्तक देती थीं। कविताओं का चयन और उनका प्रस्तुतीकरण इतना सटीक था कि सभागार में मौजूद छात्र और बुद्धिजीवी मंत्रमुग्ध होकर हर एक शब्द को अपने भीतर सोखते रहे। कविता और रंगमंच का यह अनूठा संगम आज के दौर में बहुत कम देखने को मिलता है।

जज्बातों का सफर: जहां ठहाके थे, वहां आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा

इस नाटक की स्क्रिप्टिंग की सबसे बड़ी ताकत इसका उतार-चढ़ाव था। शुरुआत से ही नाटक में छोटे शहरों की आदतों, मध्यमवर्गीय परिवारों के आपसी संवादों और दिल्ली जैसे बड़े शहर में आने वाले नए लड़के की कशमकश को बेहद कॉमिक अंदाज़ में पेश किया गया। शो के शुरुआती एक घंटे तक पूरा सभागार गट्टू भैया के कारनामों और संवादों पर ठहाकों से गूंजता रहा। मानस की कॉमिक टाइमिंग इतनी सटीक थी कि दर्शकों के लिए अपनी हंसी रोकना मुश्किल हो रहा था।

लेकिन, जैसे-जैसे कहानी अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ी, नाटक का मिजाज बदलने लगा। बड़े शहरों का अकेलापन, लगातार असफलताओं से उपजी हताशा, समाज और परिवार की उम्मीदों का बोझ जब गट्टू भैया पर भारी पड़ने लगता है, तो नाटक एक बेहद गंभीर मोड़ ले लेता है। जो प्रस्तुति पूरे समय दर्शकों को गुदगुदा रही थी, उसके अंत ने अचानक एक ऐसा मर्मस्पर्शी रूप अख्तियार किया कि पूरे सभागार में सन्नाटा पसर गया। गट्टू के जीवन का चरम द्वंद्व और उसका मानसिक तनाव जब मंच पर उभरकर आया, तो दर्शकों की आंखों से आंसू छलक पड़े। हंसते-हंसाते रुला देने की यह कलात्मक क्षमता ही मानस भारद्वाज को समकालीन कलाकारों की कतार में सबसे अलग खड़ा करती है।

जेएनयू के बुद्धिजीवियों और छात्रों ने सराहा

कार्यक्रम के समापन पर पूरा सभागार कई मिनटों तक खड़े होकर (Standing Ovation) तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। उपस्थित छात्रों, शोधार्थियों और थिएटर विशेषज्ञों ने एक सुर में माना कि ‘गट्टू भैया’ की यह कहानी केवल एक काल्पनिक नाटक नहीं है, बल्कि यह आज के दौर के युवाओं की सबसे बड़ी और कड़वी हकीकत को बयां करती है। आज जब युवाओं में मानसिक तनाव, डिप्रेशन और आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, ऐसे समय में यह नाटक बिना किसी उपदेशात्मक शैली के, कलात्मक रूप से सीधे दिल पर चोट करता है और जीवन को एक नई उम्मीद देता है।

जेएनयू के वरिष्ठ छात्रों ने कहा कि मानस भारद्वाज ने जिस तरह से एक गंभीर विषय को कविता और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया है, वह लंबे समय तक याद रखा जाएगा। उनकी हालिया किताब *”मैं एक ऐसी लड़की को जानता हूँ”* की तरह ही इस नाटक में भी इंसानी रिश्तों और भावनाओं की वही गहरी समझ दिखाई देती है, जो मानस की मुख्य पहचान बन चुकी है। कम सोशल मीडिया प्रेजेंस के बावजूद, केवल अपनी कला के दम पर इतने बड़े मंच पर ऐसा गहरा प्रभाव छोड़ना यह साबित करता है कि मानस भारद्वाज आने वाले समय में हिंदी साहित्य और स्वतंत्र रंगमंच (Independent Theatre) का एक बड़ा चेहरा बनने जा रहे हैं।

यह शो न केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि यदि आपके पास कहने के लिए एक ईमानदार कहानी हो, तो आपको किसी बड़े तामझाम की जरूरत नहीं होती। मानस भारद्वाज की यह प्रस्तुति देश के अन्य हिस्सों और महानगरों में भी ले जाई जानी चाहिए, ताकि आज का युवा इस कहानी से खुद को जोड़ सके और समझ सके कि जीवन के द्वंद्वों से लड़ना ही असल जीत है।

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