नई दिल्ली। कभी TRAI का अधिकारी बनकर फोन तो कभी पुलिस अफसर की वर्दी का खौफ दिखाती वीडियो कॉल। आधार कार्ड से विदेश में अपराध होने और मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तारी का डर दिखाकर लोगों के बैंक खाते खाली कराने वाले कथित साइबर ठगों के जाल को दिल्ली पुलिस ने समय रहते पकड़ लिया। पुलिस की सक्रियता से पांच राज्यों में कई लोगों को और रकम ट्रांसफर करने से रोका गया, जिससे करीब 1.53 करोड़ रुपये का संभावित नुकसान टल गया। निशाने पर वरिष्ठ नागरिक भी थे।
मामले की कड़ी दिल्ली के सागरपुर में रहने वाले एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी से हुई साइबर ठगी की जांच के दौरान सामने आई। इसके बाद संदिग्ध बैंक खाते के लेनदेन खंगाले गए तो पुलिस उन लोगों तक पहुंच गई, जिन्हें कथित साइबर ठग लगातार पैसे भेजने के लिए मजबूर कर रहे थे।
पहले TRAI अधिकारी बनकर फोन, फिर ‘IPS अफसर’ की वीडियो कॉल
पुलिस के मुताबिक 14 सितंबर को सागरपुर निवासी सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी से साइबर जालसाजों ने संपर्क किया। फोन करने वाले ने खुद को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) का अधिकारी बताया।
आरोप है कि ठगों ने पीड़ित को बताया कि उनके आधार कार्ड के विवरण का इस्तेमाल कर जारी किए गए सिम कार्ड और क्रेडिट कार्ड का कनाडा में आपराधिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हुआ है। इस जानकारी से उन्हें डराने के बाद ठगी का अगला चरण शुरू किया गया।
एक अन्य व्यक्ति ने कथित तौर पर खुद को दरियागंज थाने का आईपीएस अधिकारी बताते हुए वीडियो कॉल की। पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में फंसने और गिरफ्तारी का डर दिखाया गया। दबाव में आए सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी ने अपने बैंक ऑफ बड़ौदा, आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई के खातों से अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए रकम ट्रांसफर कर दी।
एक संदिग्ध खाते ने खोली दूसरे पीड़ितों तक पहुंचने की राह
मामले में 29 सितंबर को ई-एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने रकम के ट्रांजेक्शन की कड़ियां खंगालनी शुरू कीं। जांच के दौरान पता चला कि ठगी की रकम का एक हिस्सा हैदराबाद स्थित एक बैंक खाते में पहुंचा था। पुलिस को संदेह है कि इस खाते का इस्तेमाल कथित ‘म्यूल अकाउंट’ के तौर पर किया जा रहा था।
म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खातों को कहा जाता है जिनका इस्तेमाल साइबर अपराध से हासिल रकम को प्राप्त करने, आगे भेजने या उसके वास्तविक स्रोत को छिपाने के लिए किया जाता है।
इस खाते की गतिविधियों का विश्लेषण किया गया तो जांच का दायरा अचानक बढ़ गया। पुलिस के मुताबिक 21 से 29 सितंबर के बीच पांच अन्य लोगों ने भी इसी संदिग्ध खाते में रकम भेजी थी। इससे आशंका हुई कि ये लोग भी उसी या उससे जुड़े साइबर ठगी नेटवर्क के निशाने पर हैं और उनसे आगे भी पैसे ट्रांसफर कराए जा सकते हैं।
पुलिस ने पीड़ितों से सीधे किया संपर्क
इसके बाद आईएफएसओ की फाइनेंशियल मॉनिटरिंग सेल की ‘प्रोएक्टिव विक्टिम आइडेंटिफिकेशन एंड प्रोटेक्शन टीम’ सक्रिय हुई। टीम ने संदिग्ध लेनदेन के आधार पर संभावित पीड़ितों की पहचान कर उनसे संपर्क किया।
पुलिस ने संबंधित बैंकों और राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय कर लोगों को आगे रकम भेजने से रोका। इस कार्रवाई से दिल्ली के अलावा राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में संभावित पीड़ितों की रकम बचाई गई।
पुलिस के अनुसार दिल्ली में 3.48 लाख रुपये, राजस्थान में 10 लाख रुपये, उत्तर प्रदेश में 10 लाख रुपये, महाराष्ट्र में 55 लाख रुपये और गुजरात में 75 लाख रुपये का संभावित नुकसान होने से रोका गया। कुल मिलाकर यह रकम करीब 1.53 करोड़ रुपये बैठती है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर डर बना हथियार
इस तरह की साइबर ठगी में अपराधी खुद को पुलिस, जांच एजेंसी, बैंक, टेलीकॉम विभाग या दूसरी सरकारी संस्था का अधिकारी बताकर पीड़ित पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं। गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स पार्सल या पहचान के दुरुपयोग जैसी कहानी सुनाकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर बनाए रखा जाता है और रकम ट्रांसफर करने के लिए दबाव डाला जाता है।
इस मामले में भी जांच की शुरुआत एक पीड़ित की शिकायत से हुई, लेकिन संदिग्ध बैंक खाते की निगरानी ने पुलिस को दूसरे संभावित पीड़ितों तक पहुंचा दिया। समय रहते संपर्क होने से पांच राज्यों में जालसाजों के खातों में जाने वाली 1.53 करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम बच गई।




