नई दिल्ली, 10 अगस्त। अस्पतालों से निकलने वाले बायोमेडिकल कचरे के सुरक्षित निपटान को लेकर देश के कई राज्यों में गंभीर लापरवाही सामने आई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को दी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बायोमेडिकल कचरे के ‘डीप बरीअल’ से जुड़े नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है।
सबसे गंभीर स्थिति उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के सभी 111 और राजस्थान के सभी 33 संबंधित स्वास्थ्य केंद्र निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं पाए गए। नियमों की अनदेखी से मिट्टी और भूजल के प्रदूषित होने का खतरा बढ़ सकता है।
9,178 स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ 5,715 मानकों पर खरे
सीपीसीबी के अनुसार, देशभर में 9,178 स्वास्थ्य केंद्र बायोमेडिकल कचरे के निपटान के लिए ‘डीप बरीअल’ व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहे थे। इनमें से केवल 5,715 स्वास्थ्य केंद्र ही निर्धारित मानकों का पालन करते पाए गए।
जांच में 477 स्वास्थ्य केंद्रों में बड़ी खामी सामने आई। यहां कचरा दबाने वाली जगह और भूजल स्तर के बीच अनिवार्य कम से कम छह मीटर की दूरी नहीं थी। वहीं 341 स्वास्थ्य केंद्रों के पास जरूरी प्राधिकरण की मंजूरी भी नहीं मिली।
इससे साफ है कि कई जगहों पर सिर्फ कचरा निपटान की व्यवस्था ही सवालों के घेरे में नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों और आवश्यक अनुमतियों की भी अनदेखी की जा रही है।
किन परिस्थितियों में किया जा सकता है ‘डीप बरीअल’?
बायोमेडिकल कचरे को जमीन में दबाकर निपटाने की अनुमति सामान्य परिस्थितियों में नहीं है। बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के तहत ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सीमित परिस्थितियों में ही ‘डीप बरीअल’ की अनुमति दी जाती है, खासकर तब जब वहां साझा बायोमेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट सुविधा उपलब्ध न हो।
इसके लिए संबंधित राज्य प्राधिकरण से पूर्व अनुमति लेना जरूरी है। इसके अलावा कचरा दबाने वाली जगह और भूजल स्तर के बीच कम से कम छह मीटर की दूरी बनाए रखना अनिवार्य है।
इन नियमों का मकसद संक्रमित और खतरनाक अस्पताल कचरे से मिट्टी, भूजल और आसपास के पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकना है।
आठ सप्ताह में सुधार नहीं हुआ तो सख्त कार्रवाई
सीपीसीबी ने एनजीटी को बताया कि नियमों का पालन नहीं करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधित प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों को इसकी जानकारी भेज दी गई है। उन्हें कमियों को दूर कर नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया है।
यदि तय अवधि में सुधार नहीं किया जाता है तो पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत कार्रवाई के निर्देश जारी किए जा सकते हैं। इसके तहत बाध्यकारी आदेश जारी करने के साथ किसी गतिविधि को नियंत्रित या बंद करने तथा बिजली-पानी जैसी सेवाओं की आपूर्ति रोकने तक के निर्देश दिए जा सकते हैं।
एनजीटी ने मांगी आगे की कार्रवाई की रिपोर्ट
एनजीटी इस मामले में बायोमेडिकल कचरे के उपचार, रखरखाव और निपटान में सामने आई कमियों की निगरानी कर रहा है। अधिकरण ने सीपीसीबी को इस दिशा में हुई आगे की कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले प्रस्तुत करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आठ सप्ताह की समयसीमा के भीतर संबंधित राज्य और केंद्र शासित प्रदेश नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाते हैं। खासतौर पर उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सभी संबंधित स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति में सुधार कितना होता है, इस पर भी एनजीटी की निगरानी रहेगी।




