देश की राजधानी दिल्ली में अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा है। प्रशासन के कड़े दावों के बावजूद बदमाशों के मन से पुलिस और कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है। अब हालत यह हो गई है कि मामूली कहासुनी में भी लोग एक-दूसरे की जान लेने पर आमादा हो जाते हैं। हाल ही में बेगमपुर इलाके में हुई एक वारदात इसका ताजा उदाहरण है, जहां सिर्फ ₹700 के लेन-देन को लेकर हुए झगड़े में एक शख्स को मौत के घाट उतार दिया गया।
यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि देश के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहर में जब ऐसे हालात हैं, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि लोगों का धैर्य इतना खत्म हो चुका है कि छोटी-सी बात पर भी वे किसी का कत्ल करने से नहीं हिचकते। हालांकि पुलिस ने इस मामले में तीन लोगों को पकड़ लिया है, लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या किसी इंसान की जिंदगी की कीमत सिर्फ कुछ सौ रुपये रह गई है?
इतनी छोटी रकम के पीछे किसी का खून कर देना सिर्फ पुलिस और प्रशासन की नाकामी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के बदलते ढर्रे की ओर भी इशारा करता है। दुखद पहलू यह भी है कि जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो आसपास मौजूद लोग मदद के लिए हाथ बढ़ाने के बजाय चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं। यह संवेदनहीनता दिखाती है कि हमारा समाज कितना आत्मकेंद्रित होता जा रहा है और लोगों में मानवीय संवेदनाएं खत्म हो रही हैं।
शहरी इलाकों में जुर्म बढ़ने के पीछे आर्थिक तंगी भी एक बड़ी वजह है। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी ने आम आदमी का जीना दुश्वार कर दिया है, जिसके चलते लोग जरा-से पैसों के लिए भी खूनी खेल खेलने को तैयार हो जाते हैं।
कुछ ही समय पहले तिलक नगर में भी महज ₹150 के विवाद में एक युवक को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। साफ है कि कानून व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को न सिर्फ गश्त और मुस्तैदी बढ़ानी होगी, बल्कि समाज में गहराती इस आर्थिक और सामाजिक असमानता पर भी ध्यान देना होगा।




