अलीगढ़। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) में छात्र को बंधक बनाकर मारपीट करने और कथित अश्लील वीडियो के जरिए ब्लैकमेल कर रुपये वसूलने के आरोप वाले मामले में आरोपी बीबीए छात्र शहजिल शान खान को अदालत से बड़ी राहत मिली है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रभारी) की अदालत ने उसकी गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए पुलिस की 14 दिन की रिमांड की मांग खारिज कर दी।
अदालत ने आरोपी को 25 हजार रुपये के व्यक्तिगत बंधपत्र पर रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि, मामले की जांच अभी जारी है और पुलिस को आरोपों से जुड़े साक्ष्य जुटाने के निर्देशों के तहत विवेचना आगे बढ़ानी है।
छात्र को कमरे में बुलाकर बंधक बनाने का आरोप
मामले में शिकायतकर्ता पक्ष ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे को बहाने से एएमयू परिसर स्थित विकारुल मुल्क (वीएम) हॉल के एक कमरे में बुलाया गया। आरोप है कि वहां उसे बंधक बनाकर मारपीट की गई और कथित अश्लील वीडियो के जरिए ब्लैकमेल करते हुए उससे रुपये की मांग की गई।
इस शिकायत के आधार पर सिविल लाइन थाने में शहजिल शान खान के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया और पूछताछ के लिए 14 दिन की पुलिस रिमांड मांगी।
25 दिन की देरी पर अदालत ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एफआईआर दर्ज होने में हुई देरी का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने पाया कि कथित घटना 17 अगस्त 2026 की बताई गई है, जबकि मुकदमा 11 सितंबर 2026 को दर्ज हुआ। अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने में हुई करीब 25 दिन की देरी का शिकायत में कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है।
केस डायरी में सामने आई जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ता का बेटा आरोपी के संपर्क में एक समलैंगिक डेटिंग एप के जरिए आया था और दोनों के बीच मुलाकात हुई थी। अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए प्रथम दृष्टया यह माना कि मामले में लगाई गई गंभीर धाराएं इस स्तर पर पूरी तरह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होतीं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
अदालत ने आरोपी की गिरफ्तारी पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) और सत्येंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई (2022) मामलों में दिए गए दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट का दायित्व है कि वह कानून के तहत आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करे। इसी आधार पर पुलिस का रिमांड प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया गया।
हालांकि, आरोपी को जांच में सहयोग करने और साक्ष्यों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं करने की शर्त पर रिहा किया गया है।
एक मामले में राहत, दूसरी एफआईआर से मुश्किलें बरकरार
सिविल लाइन थाने में दर्ज मामले में आरोपी को अदालत से राहत मिल गई है, लेकिन उसकी कानूनी परेशानियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। जानकारी के मुताबिक, बन्नादेवी थाने में दर्ज एक अन्य एफआईआर के चलते पुलिस की कार्रवाई का सामना अभी भी करना पड़ सकता है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अदालत से रिहाई मिलने का मतलब यह नहीं है कि मामला खत्म हो गया है। मुकदमा कायम है और विवेचना जारी है।
पुलिस जुटा रही साक्ष्य
सीओ तृतीय सर्वम सिंह के मुताबिक, मुख्य आरोपी को अदालत से राहत मिली है। शिकायत में लगाए गए आरोपों में सात वर्ष से कम सजा का प्रावधान वाली धाराएं शामिल हैं, जिसके चलते अदालत ने गिरफ्तारी और रिमांड के संबंध में राहत दी है।
पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और आरोपों की पुष्टि के लिए आवश्यक साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। विवेचना पूरी होने के बाद उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।




