नई दिल्ली: बच्चों के अपहरण और उनकी कथित तस्करी से जुड़े मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। देश में बच्चों के गायब होने, उन्हें जबरन दूसरे राज्यों में ले जाने और कथित तौर पर संगठित अपराधों में इस्तेमाल किए जाने के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने केंद्र सरकार और सभी संबंधित राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है।
मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसे अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दाखिल किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बच्चों के अपहरण और तस्करी के पीछे अलग-अलग स्तर पर संगठित गिरोह सक्रिय हैं और मौजूदा जांच एवं न्यायिक व्यवस्था ऐसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अपहरण के पीछे सक्रिय बताए गए कई तरह के गिरोह
PIL में दावा किया गया है कि बच्चों को सिर्फ फिरौती या व्यक्तिगत दुश्मनी के लिए ही अगवा नहीं किया जाता, बल्कि इसके पीछे बड़े संगठित नेटवर्क भी काम कर सकते हैं।
याचिका में गैर-कानूनी गोद लेने के रैकेट, अंतरराज्यीय बाल तस्करी गिरोह और बच्चों के शोषण से जुड़े नेटवर्क का जिक्र किया गया है। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में बच्चों को भीख मंगवाने, बाल मजदूरी और देह व्यापार जैसी अवैध गतिविधियों में धकेला जाता है।
याचिका में बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि कुछ मामलों में बच्चों को कथित तौर पर अंगों की तस्करी और गैर-कानूनी मेडिकल ट्रायल जैसे अपराधों के लिए भी निशाना बनाया जा सकता है।
FIR में देरी से लेकर जांच की रफ्तार पर सवाल
याचिका में पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। दावा है कि कई मामलों में बच्चा लापता होने या अपहरण की सूचना मिलने के बावजूद FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने में देरी होती है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, शुरुआती घंटों में कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि अपहरण के बाद बच्चे को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का खतरा बना रहता है। जांच में देरी होने पर कथित तस्करी गिरोहों को बच्चों को दूर ले जाने और सबूत मिटाने का मौका मिल सकता है।
PIL में यह भी कहा गया है कि लंबे समय तक चलने वाली जांच और ट्रायल के कारण ऐसे संगठित नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई का असर कमजोर पड़ता है।
ACP या SHO स्तर के अधिकारी करें जांच
याचिका में बच्चों के अपहरण के मामलों की जांच के लिए अलग और मजबूत व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।
इसके तहत प्रस्ताव रखा गया है कि ऐसे मामलों की जांच कम से कम ACP या SHO स्तर के अधिकारी की निगरानी में कराई जाए। साथ ही बच्चों के अपहरण से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने की मांग की गई है।
याचिका में सुझाव दिया गया है कि इन मामलों का निपटारा एक साल के भीतर किया जाए, ताकि पीड़ित बच्चों को जल्द न्याय मिल सके और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई में अनावश्यक देरी न हो।
बिहार के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
PIL में 1 जून 2026 तक के आंकड़ों का हवाला देते हुए बिहार में बच्चों के लापता होने की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है।
याचिका के मुताबिक, वर्ष 2013 से बिहार में हर साल करीब 15 हजार गुमशुदगी के मामले दर्ज होते रहे हैं। दावा है कि इनमें बड़ी संख्या बच्चों की है, जबकि करीब आधे बच्चों के ही बरामद होने की बात कही गई है।
याचिका में इन आंकड़ों के जरिए बच्चों की तलाश और उन्हें सुरक्षित वापस लाने के लिए मौजूदा तंत्र को और प्रभावी बनाने की जरूरत बताई गई है।
मानव तस्करी के मामलों पर भी चिंता
याचिका में NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए देश में मानव तस्करी के मामलों को लेकर भी चिंता जाहिर की गई है।
PIL के अनुसार, ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में मानव तस्करी के अधिक मामले सामने आए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी के मामलों में ओडिशा को सबसे ऊपर बताया गया है, जबकि बिहार उसके बाद है। वहीं नाबालिग लड़कियों की तस्करी के मामलों में राजस्थान का जिक्र किया गया है।
याचिका के मुताबिक, तस्करी के बाद बच्चों का इस्तेमाल भीख मंगवाने, मजदूरी और देह व्यापार समेत अलग-अलग अवैध गतिविधियों में किए जाने का आरोप है।
दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का भी दिया उदाहरण
जनहित याचिका में 5 जून 2026 को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के मुताबिक, पुलिस ने कथित बाल तस्करी नेटवर्क से जुड़े 13 लोगों को गिरफ्तार किया था।
पुलिस के अनुसार, यह नेटवर्क दिल्ली के अलावा हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात तक फैला हुआ था। आरोप है कि गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और BPL परिवारों को निशाना बनाकर नवजात बच्चों का अपहरण करता था।
याचिका में दावा किया गया है कि इन बच्चों को कथित तौर पर 8 से 10 लाख रुपये तक में बेचा जाता था।
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब राज्यों के जवाब पर नजर
बच्चों के अपहरण और तस्करी के मामलों को लेकर दाखिल इस PIL ने जांच व्यवस्था, पुलिस की कार्रवाई और मामलों के जल्द निपटारे पर बड़ा सवाल खड़ा किया है।
अब केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को अदालत के सामने अपना पक्ष रखना है। सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि बच्चों के अपहरण और तस्करी के मामलों की जांच और सुनवाई के लिए मौजूदा व्यवस्था में किस तरह के बदलाव की जरूरत है।




