नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दल-बदल कानून से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की ओर से दायर याचिका में कानून की मौजूदा व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की गई है। उन्होंने उस प्रावधान को चुनौती दी है, जिसके तहत विधायक और सांसद किसी दूसरी पार्टी में विलय का दावा कर अयोग्यता से बच सकते हैं।
सोमवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि इस मामले में कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर निर्णय संसद को लेना है। अदालत ने टिप्पणी की कि दसवीं अनुसूची संसद ने बनाई है और उससे जुड़े सिस्टम को तय करना भी संसद का ही अधिकार है।
कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि दलबदल से जुड़ा एक समान मामला गोवा का भी लंबित है। इसके बाद बेंच ने उनकी याचिका को गोवा मामले के साथ टैग कर दिया। सिब्बल ने यह याचिका अपनी व्यक्तिगत क्षमता में दायर की है और 22 जुलाई को इसकी तत्काल सुनवाई की मांग की थी।
याचिका में सिब्बल ने कहा है कि दसवीं अनुसूची का पैरा-4 दलबदल को बढ़ावा देता है और इसकी मौजूदा व्याख्या संविधान के मूल ढांचे के विपरीत है। उनका दावा है कि इससे थोक में दलबदल, हॉर्स ट्रेडिंग और जनादेश बदलने जैसी स्थितियां पैदा हो रही हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि पिछले एक दशक में गोवा, अरुणाचल प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में दलबदल के कारण सरकारें गिरीं या बनने से रुक गईं। साथ ही बसपा, कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी जैसी पार्टियों के प्रभावित होने का भी उल्लेख करते हुए पैरा-4 की व्याख्या सीमित करने की मांग की गई है।




